आखिर क्यों जरुरी हो जाता है मास क्वारांटाइन?

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डॉक्टर प्रवीण झा

इसकी जरूरत अमूमन नहीं पड़ती, लेकिन बड़े देशों में यह कभी-कभी जरूरी होता है। जैसे चीन और भारत बड़े देश हैं, जहाँ अगर संक्रमण का केंद्र मालूम है, तो उसे बाकी के देश से काट कर ‘क्वारांटाइन’ करना पड़ता है। चीन में इसमें कुछ देर हुई, लेकिन पहले वूहान और आस-पास के शहरों के रास्ते बंद कर दिए गए, फिर पूरे हूबइ प्रांत के। इस वजह से काफी हद तक संक्रमण उस इलाके तक सीमित रह गया, और पूरे चीन में उस विकराल रूप में नहीं पसरा। इसका प्रबंधन भी सुलभ होता है कि पूरे देश की बजाय एक क्षेत्र पर फोकस करना। और आज चीन इस स्थिति में पहुँच रहा है कि एक भी नए केस नहीं मिल रहे। यह भारत में भी पहले गुजरात प्लेग के समय किया जा चुका है।

नॉर्वे में मेरे जिले में पिछले हफ्ते में मात्र एक केस मिला। मेरे पड़ोस के दो जिलों में भी बस एक-एक केस हैं। लेकिन ठीक अगले दो जिलों को मिला कर एक हज़ार केस हैं! ऐसा कैसे संभव है कि दो जिले मिला कर हज़ार केस हों, और पड़ोसी में बस एक? यह तो कोई तार्किक अनुपात ही नहीं। और ऐसा भी नहीं कि ट्रेन-बस बंद कर दिए गए। यह ‘मास क्वारांटाइन’ से संभव हो पाता है, जब उस क्षेत्र के लोगों को आवा-जाही बंद करने कह दिया जाता है। अब बीमारी पूरी गति से पसरेगी, लेकिन एक सीमित क्षेत्र में। वहाँ सरकारी फंड और संसाधन भी केंद्रित किए जाएँगे। इससे कुछ बीमारियों में एक सामूहिक इम्यूनिटी भी बनती है, जिसे ‘हर्ड इम्यूनिटी’ कहते हैं। लेकिन, कोरोना में यह संभव नहीं हो सका है।

भारत में भी यह पद्धति लागू है ही, और हो भी रही है। महाराष्ट्र से यातायात घटाने के प्रयास चल रहे हैं। जिन शहरों में एक भी केस मिल रहे हैं, वहाँ धारा 144 लगाने की कवायद चल रही है। यानी, उस शहर के लोग सामूहिक रूप से क्वारांटाइन पर चले जाएँ और आगे पसरने न दें।

यह ब्रह्मास्त्र है, लेकिन आर्थिक रूप से यह सबसे कारगर उपाय है। क्योंकि पूरे देश में पसरने के बाद संसाधन का वितरण असंभव होता जाता है, जिस समस्या से अमरीका जैसा शक्तिशाली और धनी देश अब जूझ रहा है।

समुदाय चेतना

यह मानव-संस्कृति का हिस्सा रहा है, जो छोटे-बड़े कार्य से लेकर आपदा तक के लिए प्रयोग में रहा है। इसका फॉर्मैट साधारण है। एक समुदाय एक लक्ष्य तय करता है, जैसे बाढ़ के समय टूटे पुल की मरम्मत करनी है। हर उम्र के लोग जमा होते हैं, सामान इकट्ठा किए जाते हैं, वहीं साझा चूल्हा पर खाना बन रहा होता है, गीत गा रहे होते हैं और पुल बन रहा होता है। बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में यह (कन्सार) आम है। सरकारी मदद तो जब आएगी, तब आएगी। शायद कभी न आए।

यूरोपीय देशों में यह विश्व-युद्ध के समय शुरू हुआ, जब राज्याध्यक्ष हिटलर के आक्रमण से भाग गए, सरकार रही नहीं, और जनता ने खुद ही मिल कर कार्य संभालने शुरू किए। यह प्रथा नॉर्वे में ‘दुग्नाद’ कहलाती है। इसमें लोगों को एक नोटिस आ जाता है कि आज मुहल्ले के सभी गिरे पेड़ हटा कर किनारे करने हैं और सफाई करनी है। यह कहने के लिए स्वैच्छिक है, लेकिन, यह होता अनिवार्य है। आप चाहे कितने भी अमीर हों, आपको फावड़ा, बड़े झाड़ू लेकर पहुँचना ही है। वहाँ खाने-पीने का इंतजाम भी सब मिल कर करेंगे, संगीत बजेगा, और काम होगा। हद तो यह है कि सरकारी स्कूलों के मैदान और कैम्पस की अर्धवार्षिक सफाई भी सरकार नहीं करती, सभी अभिभावक मिल कर करते हैं। यही सालों से प्रथा चली आ रही है।

लगभग एक हफ्ते पहले नॉर्वे की प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय दुग्नाद की घोषणा कर दी। ऐसा दशकों से नहीं हुआ था। इसका अर्थ ही है कि अब सरकार बस सहायक भूमिका निभाएगी, कार्य तो जनता को ही करना है। अब फेसबुक का जमाना है तो वहाँ भी कैम्पेन शुरू हो गए, लक्ष्य दिए जाने लगे। उन्हीं में एक लक्ष्य है कि एक भी क्वारांटाइन घर से निकलने न पाए। मुहल्ले वाले यह सुनिश्चित करें, जरूरत हो तो पुलिस को खबर करें। उनको राशन-पानी की जरूरत हो तो लाकर देते रहें, लेकिन घर से निकलने न दें। और अब नया लक्ष्य मिला है कि जितने भी स्वास्थ्य में थोड़े-बहुत भी अनुभव वाले लोग हैं, वे रजिस्टर करें। यह मास-मेसेज सरकार की तरफ से सबको मिल गया।

अब इसमें यह नहीं कह सकते कि यह मेरी जिम्मेदारी नहीं, सरकार की है। सरकार की भूमिका बस कोऑर्डिनेशन की है। और उन हज़ारों लोगों की मदद, जिन्हें नौकरी से निकाला जा रहा है। निजी अस्पतालों ने जब अपने द्वार खोल दिए हैं, तो उनके होने वाली आर्थिक हानि में भी सरकार कुछ मदद कर रही है। लेकिन, कुल मिलाकर सामुदायिक चेतना का अर्थ यही है कि अब सरकार भी इस समुदाय का हिस्सा ही है। उसे भी हमें ही बचाना है। यह राष्ट्र-आपदा ही नहीं, विश्व-आपदा है और इसमें निजी स्वार्थ का स्थान न्यूनतम है।

यह आपदा खत्म हुई तो यही लोग एक-दूसरे का मुँह भी नहीं ताकेंगे। बैक टू बिजनेस चल देंगे। भारत इस मामले में कई कदम आगे है, और यहाँ समुदाय-बोध कभी खत्म नहीं होता। बस इसे जगाने की देरी है। यह इमरजेंसी है और मान कर चलिए कि दुनिया की काबिल सरकारों में भी इसे रोकने की शक्ति नहीं। 

(प्रवीण झा नार्वे के एक अस्पताल में डॉक्टर है. वे चिकिस्ता से लेकर साहित्य विषयों के अग्रणी और लोकप्रिय लेखक हैं.)

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